स्पष्टता न्यूज
नयी दिल्ली। कैंसर की दवा पर 10 गुना मार्जिन से सुप्रीम कोर्ट नाराज आज नाराज हो गया। अदालत ने कहा कि यह तो कत्लेआम है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा- अगर मरीज सरकारी योजना में इलाज करा रहा है तो इतनी बढ़ी हुई कीमत का भुगतान कौन करता है। इसका बोझ सरकारी खजाने और टैक्सपेयर्स पर ही पड़ता है। प्राइवेट हॉस्पिटल इंडस्ट्री की तरह काम कर रहे हैं। वे अपनी फार्मेसी से ही दवा खरीदने को मजबूर करते हैं। सरकार की ओर से तुषार मेहता ने कहा- फार्मा कंपनियां लाभ कमाने वाली नहीं हैं। ऐसा लगता है कि लाभ कमाने वाले निजी अस्पताल हैं।
याचिकाकर्ता का दलील थी जिन दवाओं की कीमत सरकार तय करती है, उनका बाजार में हिस्सा कम है। जिनकी कीमत सरकार तय नहीं करती, उनकी करीब 80% से ज्यादा हिस्सेदारी है। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि इससे दवाओं की कीमत और मरीजों के इलाज का खर्च बढ़ सकता है। कई मरीज इलाज के लिए अपनी संपत्ति या गहने तक बेचने को मजबूर होते हैं। कैंसर की दवाओं पर रिटेल कीमत और एमआरपी के बीच 10 गुने के भारी मार्जिन पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त ऐतराज जताते हुए इसे ‘कत्लेआम’ और ‘दिनदहाड़े डकैती’ करार दिया। कोर्ट ने कहा कि जब किसी कैंसर की दवा की कीमत रिटेलर को महज 2,700 रुपये में मिलती है, लेकिन उसका अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) 27,000 रुपये रखा जाता है, तो यह आम मरीज और करदाताओं पर भारी बोझ है।
कोर्ट ने सभी दवाओं पर समान रूप से 16 फीसदी मार्जिन तय करने की संभावना पर केंद्र से विचार करने को कहा। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने सुनवाई के दौरान टिप्पणी की, “यह कत्लेआम है, बिल्कुल सीधी बात है। शीर्ष अदालत ने कहा कि कॉरपोरेट अस्पतालों में मरीजों को अपने ही केमिस्ट या किसी खास फार्मेसी से दवा खरीदने के लिए मजबूर किए जाने की शिकायतें भी गंभीर हैं।
