स्पष्टता न्यूज़
कोलकाता। छोटे किराना दुकानदारों से लेकर बड़े थोक व्यापारियों तक, यूपीआई आज भारतीय बाजार की रीढ़ बन चुका है। चिल्लर की किल्लत और नकदी संभालने के झंझट से मुक्ति दिलाने वाले इस डिजिटल माध्यम को लेकर अब व्यापारियों में चिंता और असंतोष का माहौल है। देश के प्रमुख व्यापारिक केंद्रों में शुमार कोलकाता के बड़ा बाजार में 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई लेन-देन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट या अतिरिक्त शुल्क लगाए जाने की चर्चाओं ने कारोबारियों की परेशानी बढ़ा दी है।
त्योहारी सीजन यानी दुर्गा पूजा की चौखट पर खड़े व्यापारियों का कहना है कि पहले से ही बाजार मंदी की मार झेल रहा है। ऐसे दौर में डिजिटल लेन-देन पर अतिरिक्त खर्च थोपना व्यापार को पटरी से उतारने जैसा कदम साबित होगा।
‘पहले आदत लगाई, अब चार्ज लगा रहे हैं’
बड़ा बाजार के व्यापारियों का स्पष्ट मानना है कि सरकार और डिजिटल पेमेंट कंपनियों ने पहले कैशलेस इकोनॉमी को बढ़ावा देने के लिए यूपीआई को मुफ्त उपलब्ध कराया। व्यापारियों ने खाता प्रबंधन, बैंक डिपॉजिट और तकनीकी दिक्कतों को सीखकर इसे अपनाया। अब जब पूरा तंत्र यूपीआई का आदी हो चुका है, तब शुल्क लगाने की तैयारी अनुचित है।
कारोबारियों का तर्क है कि व्यापारी हमेशा लागत बचाने के रास्ते तलाशता है। जैसे मोबाइल रिचार्ज या बिजली बिल पर अतिरिक्त प्लेटफॉर्म फीस लगने पर लोग तुरंत वैकल्पिक ऐप चुन लेते हैं, वैसे ही यूपीआई पर शुल्क लगा तो लोग दोबारा नकद लेन-देन (कैश) की ओर रुख करेंगे। इससे एक बार फिर एटीएम की कतारें और नकदी का दबाव बढ़ेगा।
व्यापारियों की प्रमुख चिंताएं:
अंतिम बोझ ग्राहक पर: भले ही इसे मर्चेंट शुल्क कहा जाए, लेकिन कारोबारी अंततः इस अतिरिक्त खर्च को खुद वहन नहीं करेंगे। थोक और खुदरा दुकानदार या तो ग्राहक से अतिरिक्त राशि मांगेंगे या फिर सीधे ऑनलाइन पेमेंट लेने से मना कर देंगे।
होलसेल और रिटेल चेन प्रभावित: 2,000 रुपये से अधिक के लेन-देन पर चार्ज लगने से थोक खरीद-बिक्री में भारी दिक्कतें आएंगी। अगर ग्राहक ऑनलाइन भुगतान करेगा और थोक व्यापारी नकद मांगेगा, तो व्यापारिक संतुलन बिगड़ जाएगा।
घटता मुनाफा और कानूनी पेच: कपड़ा व साड़ी कारोबारियों के अनुसार, बाजार में मार्जिन पहले ही बेहद कम है। जीएसटी की जटिलताओं के बीच पेमेंट चार्जेस जोड़ना दोहरी मार है। साथ ही, गलत या संदिग्ध ऑनलाइन लेन-देन के कारण बैंक खातों के फ्रीज होने जैसी समस्याओं से व्यापारी पहले से जूझ रहे हैं।
कुछ व्यापारियों का रुख यह भी है कि सरकार का जो नियम सभी पर लागू होगा, उसे मानना ही पड़ेगा। हालांकि, अधिकांश कारोबारियों की मांग है कि सरकार को डिजिटल इंडिया की सफलता को बनाए रखने के लिए बुनियादी यूपीआई ढांचे को पहले की तरह निःशुल्क ही रखना चाहिए ताकि लेन-देन की रफ्तार धीमी न पड़े।
