द बोस फाइल्स — सच या साज़िश

जब इतिहास मौन हो जाता है, तब सत्य की खोज शुरू होती है

स्पष्टता न्यूज

कोलकाता, 13 अक्टूबर। भारत की आज़ादी के लगभग आठ दशक बाद भी, स्वतंत्रता संग्राम के सबसे सम्मोहक और विवादित अध्यायों में से एक अध्याय देश की कल्पना को झकझोर रहा है: नेताजी सुभाष चंद्र बोस का लापता होना। राजेश गुप्ता (आईआईटीयन) द्वारा निर्देशित, द बोस फाइल्स — सच या साज़िश एक ऐतिहासिक फीचर फिल्म है, जो सम्मोहक कहानी और समकालीन जांच के माध्यम से भारत के सबसे बड़े ऐतिहासिक रहस्यों में से एक की पड़ताल करती है। दस्तावेज़ों, गवाहों के बयानों और परस्पर विरोधी आख्यानों पर आधारित यह फिल्म 1945 में विमान दुर्घटना में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु के व्यापक रूप से प्रचारित विवरण के इर्द-गिर्द उठने वाले सवालों की पड़ताल करती है; साथ ही जानकारी छिपाए जाने के आरोपों और तत्कालीन सरकारों व खुफिया एजेंसियों की भूमिका को भी उजागर करती है। इस यात्रा के ज़रिए यह फिल्म नेताजी की असाधारण विरासत और उनके लापता होने से जुड़े अनुत्तरित सवालों के प्रति जन-रुचि को पुनर्जीवित करने का प्रयास करती है।  

इस फिल्म में जाने-माने अभिनेता यतिन कार्येकर नेताजी सुभाष चंद्र बोस की भूमिका में और अमित बहल आईबी अधिकारी के किरदार में नज़र आएंगे। वीरेंद्र सक्सेना, अखिलेंद्र मिश्रा, अपूर्वा अरोड़ा, आकाशदीप अरोड़ा, राजीव कुमार और काशवी ग्रोवर भी महत्वपूर्ण चरित्र भूमिकाओं में हैं। कई लेखकों के गहन शोध पर आधारित इस फिल्म को एक विस्तृत प्रमाणन प्रक्रिया के बाद सेंसर की मंज़ूरी मिल गई है, जो बड़े पर्दे तक इसके सफर में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। पूर्व सिविल सेवक प्रशांत सिंघानिया इसके क्रिएटिव एडवाइजर हैं। उनके अनुसार, “यह फिल्म एक ऐसे रोल मॉडल को सामने लाने का एक ईमानदार प्रयास है, जिनके पास एक हज़ार साल के स्वतंत्र भारत का विज़न था। उन्हें राष्ट्रीय विमर्श में शामिल करना उनकी आत्मा को पुनर्जीवित करने और इस देश के युवाओं को राष्ट्रवाद के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करने जैसा होगा। कहानी के केंद्र में सच्चाई की तलाश में जुटे दो दृढ़ निश्चयी लोग हैं। एक शोधकर्ता, जिसने इस रहस्य को सुलझाने में दो दशक से अधिक का समय बिताया है और जवाब पाने की इस मुहिम में लगभग अकेले ही जुटा रहा। वहीं सच्चाई सामने लाने के अटूट संकल्प से प्रेरित एक युवा लड़की, जो उस नई पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करती है जो ऐतिहासिक विमर्श में छूटी कड़ियों पर सवाल उठाती है। उनकी यह यात्रा दृढ़ता, साहस और न्याय की खोज की एक भावुक कहानी के रूप में एक मोड़ पर आकर मिलती है। फिल्म निर्माता राजेश गुप्ता के लिए यह परियोजना उनके सिनेमाई सफर का एक और महत्वपूर्ण मील का पत्थर है, जिसमें उनकी बहुचर्चित शॉर्ट फिल्में चड्डी बडीज और द फ्लैट शामिल हैं (जिन्हें संयुक्त रूप से 12 पुरस्कार मिले), तथा हिंदी फीचर फिल्म अनलॉक ज़िंदगी (2022) शामिल है, जिसे 13 अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में चुना गया और मिलान, मैक्सिको व बोस्टन में सर्वश्रेष्ठ नैरेटिव फीचर फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया।  

फिल्म के बारे में बात करते हुए निर्देशक राजेश गुप्ता कहते हैं, “यह फिल्म केवल इतिहास को दोबारा खंगालने तक सीमित नहीं थी। इसका उद्देश्य उन सवालों को उठाना था जो पीढ़ियाँ लगातार पूछती आ रही हैं, और एक ऐसी कहानी पेश करना था जो दर्शकों को सोचने, आत्ममंथन करने और गहराई से जानने के लिए प्रेरित करे। हर बाधा को पार कर इस मुकाम तक पहुंचना हम सभी के लिए बेहद सार्थक क्षण है।” राजेश गुप्तास ने स्पषष्टरता न्यूोज को बताया कि फिल्मै आठ शहरों में रिलीज हो रही है, क्यों्कि मेरे पास बहुत लिमिटेड रिसोर्सेज़ हैं। ‘हनुमान’ अंश का अगर कंटेंट अच्छा था, तो अपने आप लोगों तक पहुंचा। तो उसी विश्वास और भरोसे के साथ में मैं बंगाल में आया हूँ कि यहां सम्मान व गर्व के साथ इसे एक्सेप्ट किया जाए। प्रशांत सिंघानिया ने स्प ष्टतता न्यूचज को बताया कि यह मेरे लिए कोई सिनेमा नहीं है, यह अवेकनिंग का एक कॉल है। आपके सामने साक्षात सारे साक्ष्य रख दिए गए हैं। अगर उसको देखने के बाद भी अगर हम सब अपनी आँख बंद करके सो जाना चाहते हैं, तो फिर वही इमेजिनरी, फिक्शनल मूवीज़ जो आती है, उसी को देख के हमें खुश रहना चाहिए। अपना सच्चा इतिहास सामने आए और हमारी आने वाली जो पीढ़ी ऐसे ही महानायकों से प्रेरित होके अपने

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