‘द बोस फाइल्स: सच या साज़िश’ की स्पेशल स्क्रीनिंग नेताजी के अनसुलझे रहस्य पर बनी फिल्म 23 अक्टूबर को होगी रिलीज

स्पष्टता न्यूज

कोलकाता। भारतीय इतिहास के सबसे बड़े और अनसुलझे रहस्यों में शुमार नेताजी सुभाष चंद्र बोस के जीवन और उनके अंतर्धान से जुड़ी गुत्थी को बड़े पर्दे पर पेश करने वाली बहुप्रतीक्षित हिंदी फिल्म ‘द बोस फाइल्स: सच या साज़िश’ की शनिवार, 3 अक्टूबर 2026 को कोलकाता स्थित द भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज के जुबली हॉल में एक विशेष स्क्रीनिंग हुई।


स्क्रीनिंग के दौरान उपस्थित दर्शकों को फिल्म के निर्देशक राजेश गुप्ता (आईआईटीयन) से सीधे संवाद करने का अवसर भी मिला। यह फिल्म आगामी 23 अक्टूबर को देशभर के सिनेमाघरों में रिलीज होने जा रही है।


स्क्रीनिंग के बाद पूर्व प्रशासनिक अधिकारी (आईआरटीएस) एवं फिल्म के क्रिएटिव एडवाइज़र प्रशांत सिंघानिया ने कहा कि यह फिल्म महज मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे संवेदनशील और अनसुलझे अध्याय को वर्षों के शोध, दस्तावेजी साक्ष्यों और बौद्धिक ईमानदारी के साथ सामने लाने का एक साहसिक प्रयास है। उनके अनुसार, किसी भी राष्ट्र का चरित्र उसके नागरिकों के चरित्र और उसके आदर्श पुरुषों एवं राष्ट्रीय नायकों से निर्मित होता है। यदि नेताजी सुभाषचंद्र बोस जैसी महान शख्सियत हमारी साझा ऐतिहासिक स्मृति से विस्मृत होती जाती हैं, तो यह हमारा दायित्व है कि उनके विचारों, उनके आदर्शों और उनसे जुड़े सत्य इतिहास को पुनः जागृत किया जाए। नेताजी केवल भारत के स्वतंत्रता संग्राम के एक महानायक नहीं, बल्कि भारत की सनातन ऋषि-परंपरा से प्रवाहित उस अखंड चेतना-धारा के एक सतत प्रवाह हैं, जिसने इस भारतभूमि को युगों से प्रेरित और प्रकाशित किया है और जो आने वाली पीढ़ियों को भी राष्ट्र, त्याग और कर्तव्य का बोध कराती रहेगी।


यह फिल्म मुख्य रूप से प्रख्यात शोधकर्ता अनुज धर और चंद्रचूड़ घोष की किताबों और शोध-दस्तावेजों पर आधारित है। फिल्म दर्शकों पर किसी निष्कर्ष को थोपने के बजाय गवाहियों, दस्तावेजों और विभिन्न दृष्टिकोणों को सामने रखकर उन्हें स्वयं विचार करने और सवाल उठाने की स्वतंत्रता देती है।


इसमें गंभीर ऐतिहासिक प्रसंग शामिल किये गये हैं। ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली और बंगाल के तत्कालीन राज्यपाल फणी भूषण चक्रवर्ती के बीच हुआ ऐतिहासिक संवाद तथा नेताजी से जुड़ा चर्चित “योर वॉर क्रिमिनल” प्रसंग दर्शकों को इतिहास की स्थापित मान्यताओं पर दोबारा विचार करने के लिए विवश करता है।


यतिन कार्येकर ने नेताजी व ‘भगवानजी’ (गुमनामी बाबा) के किरदार में जान फूंक दी है। रीता बनर्जी के चरित्र के साथ उनका भावनात्मक संवाद फिल्म के सबसे मार्मिक पलों में से एक है।


निर्देशक राजेश गुप्ता ने स्वयं शोधकर्ता अनुज धर से प्रेरित भूमिका निभाते हुए एक आम नागरिक के एकाकी और कठिन संघर्ष को पूरी प्रामाणिकता के साथ जिया है। वीरेंद्र सक्सेना (बिमल नंदी के रूप में) और अखिलेन्द्र मिश्रा (विश्वंभर नाथ अरोड़ा के रूप में) का अभिनय बेहद सधा हुआ और प्रभावशाली रहा है। युवा अभिनेत्री अपूर्वा अरोड़ा (वीराली के रूप में) आज की नई पीढ़ी की ऐतिहासिक सत्य को जानने की ललक का प्रतिनिधित्व करती हैं।


सिनेमैटोग्राफी और दृश्य संयोजन बेजोड़ है। फिल्म का विजुअल ट्रीटमेंट और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का सेटअप दर्शकों को सीधे उस दौर के अकेलेपन, त्याग और राष्ट्रीय गौरव के माहौल में ले जाता है। समीक्षा में रेखांकित किया गया है कि जहां व्यावसायिक सिनेमा केवल मनोरंजन तक सीमित रहता है, वहीं ‘द बोस फाइल्स’ जैसी फिल्में दशकों में एकाध बार बनती हैं जो राष्ट्रीय चेतना को झकझोरती हैं और स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान के प्रति सच्ची कृतज्ञता व्यक्त करती हैं। फिल्म 23 अक्टूबर 2026 से बड़े पर्दे पर दर्शकों के लिए उपलब्ध होगी।


स्पष्टता न्यूज से एक खास साक्षात्कार में फिल्म के निर्देशक राजेश गुप्ता ने बताया कि सुभाष बाबू का जो कैरेक्टर है, उसके बारे में मुझे बोलने की ज़रूरत नहीं है। ही वाज़ द सेकंड पर्सन टू बी फ़ीचर्ड ऑन टाइम्स मैगज़ीन। और वो 20वीं शताब्दी के पांच बड़ी शख्सियतों में से एक थे। पूरा वर्ल्ड उनको पांच बड़ी शख्सियतों में से एक मानता है।


उन्होंने बताया कि मेरी हैसियत नहीं है कि मैं उनपर ज़्यादा कुछ बोलूँ या उनपर फ़िल्म बनाऊँ। मैं स्टोरीटेलर हूँ फ़िल्म में, जो कहानी को बता रहा है। बाक़ी इसमें यतिन जी हैं, जिन्होंने ‘मुन्ना भाई एमबीबीएस’ में डॉक्टर आनंद बनर्जी का रोल किया था। उसके अलावा वीरेंद्र सक्सेना, अखिलेन्द्र मिश्रा, अपूर्वा अरोड़ा, आकाशदीप अरोड़ा… मने कई लोगों ने अपना-अपना कैरेक्टर बहुत ही अच्छी तरह प्ले किया है। तो मेरे ख़्याल से मैं ख़ाली इतना ही कहूँगा कि आप जब भी इस फ़िल्म को देखने के लिए थिएटर में जाएँगे, तो आपकी जो सोच होगी या जो आपका माइंडसेट होगा, जब आप फ़िल्म देख के निकलेंगे, तो वो बदल चुका होगा।


आज की स्क्रीनिंग के बाद स्टुडेंट्स व अन्य लोगों की प्रतिक्रिया कैसी थी, के बारे में पूछने पर उन्होंने कहा कि ये एक टोटल प्लेज़ेंट सरप्राइज़ था कि हमारी जेन-ज़ी इस कहानी के साथ ख़ुद को आइडेंटिफ़ाई कर पा रही है। और वही हमारा मक़सद था कि सुभाष बाबू की कहानी को जेन-ज़ी के साथ जोड़ना। और ये इसका सबूत है कि ये लोग पूरे टाइम तक यहाँ मौजूद थे।

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